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‘चारु मुसेल’

Fri 29 May, 2020

हाल ही में स्थानिय रूप से दक्षिण और मध्य अमेरिकी समुद्री तटों पर मिलने वाले  आक्रमणशील ‘चारु मुसेल’ (Charru Mussel) का भारत के केरल में तेज़ी से प्रसार देखा जा रहा है, जो पर्यावरणविदो के लिए  चिंता का विषय बना हुआ है। 

पृष्ठभूमि

  • चारु मुसेल’ के पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव के साक्ष्य मौजूद नहीं हैं लेकिन फ्लोरिडा में इसके द्वारा विद्युत ऊर्जा संयंत्र प्रणाली को प्रभावित कर आर्थिक नुकसान पहुँचाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • वर्ष 1986 में पहली बार फ्लोरिडा में पाए गए चारु मुसेल वर्तमान में मध्य फ्लोरिडा से मध्य जॉर्जिया के तटों तक पाए जाते हैं। 

मुख्य बिंदु

  • हाल ही में किये एक सर्वेक्षण में कडिनमकुलम, परावुर, एडवा-नादायरा, कायमकुलम इत्यादि स्थानों पर चारु मुसेल अत्यधिक हैं और कोल्लम ज़िले में स्थित अष्टमुडी झील में इनकी संख्या प्रति वर्ग किलोमीटर 11384 है।
  •  ‘एक्वेटिक बॉयोलॉज़ी एंड फिशरीज़’ (Aquatic Biology and Fisheries) पत्रिका में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार, वर्ष 2017 में चक्रवात ओखी (Ockhi) के कारण चारु मुसेल का तेज़ी से प्रसार हुआ है। 
  • संभावना यह भी जताई जा रही है कि चारु मुसेल समुद्री जहाजों से चिपक कर भारतीय तटों पर आए हैं।

चारु मुसेल (Charru Mussel)

  • ‘मायटेला चर्रुअना’ (Mytella Charruana) के रूप में जाने वाले चारु मुसेल पर छोटे और कवचधारी होते हैं जिनकी कवच की सतह पर पसलियाँ नहीं होती हैं।  
  • कवच का बाहरी हिस्सा हल्के हरे तथा काले रंग का होता है, जबकि कवच की आंतरिक सतह बैंगनी रंग की होती है।
  • यह अत्यधिक खारे जल में रह सकते हैं परंतु कम तापमान में इनकी सहनशीलता सीमित होती है।